नरक चतुर्दशी —
छोटी दिवाली,
रूप चौदस,
काली चौदस
1. कब है 2026 में?
2. चतुर्दशी तिथि: 7 नवंबर 2026 सुबह 10:47 से 8 नवंबर सुबह 11:27 तक
3. यम दीपदान: 7 नवंबर शाम 5:31 से रात 8:09 तकअभ्यंग स्नान:
4. 8 नवंबर सुबह 5:41 से 6:38 तकइसलिए 7 नवंबर को शाम को दीपदान और 8 नवंबर को सुबह स्नान —
दोनों दिन का पर्व
दो भागों में मनाया जाता है।
5. महत्ता क्या है? — अंधकार पर प्रकाश की विजय
नरक चतुर्दशी
कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाई जाती है। यह केवल दीपावली से एक
दिन पहले का पर्व नहीं है, बल्कि आत्मशुद्धि, पाप-मुक्ति और अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति का पर्व है।
शास्त्रों में इसे नरक की यातनाओं से मुक्ति दिलाने वाला और जीवन में सात्विकता
लाने वाला माना गया है।
3. मुख्य कथा — श्रीकृष्ण और नरकासुर वध
नरकासुर ने देवताओं,
ऋषियों को कष्ट दिया
और 16,000 कन्याओं को बंदी बना लिया था। देवताओं के निवेदन पर भगवान श्रीकृष्ण ने पत्नी
सत्यभामा की सहायता से चतुर्दशी के दिन नरकासुर का वध किया और उन स्त्रियों को
मुक्त कराया।
दूसरी मान्यता में सत्यभामा
ने ही वध किया, क्योंकि नरकासुर को वरदान था कि उसकी मृत्यु केवल उसकी माता
—
भूदेवी के अवतार —
के हाथों होगी। मरते
समय नरकासुर ने वरदान माँगा कि इस दिन लोग दीप जलाकर उत्सव मनाएँ,
शोक नहीं। तभी से
दीपदान की परंपरा चली।
दूसरी कथा —
राजा बलि और वामन
वरदान
वामन अवतार के समय
राजा बलि ने अपना संपूर्ण राज्य दान कर दिया था। भगवान वामन ने उन्हें वरदान दिया
कि त्रयोदशी से अमावस्या तक का काल उनका राज्य माना जाएगा और चतुर्दशी के दिन
दीपदान करने वाले मनुष्यों को न तो नरक का भय होगा और न ही यमराज की यातना प्राप्त
होगी।
पाँच प्रमुख कर्म —
धर्मसिन्धु के
अनुसारतैलाभ्यंग स्नान: तिल के तेल से मालिश और स्नानकार्तिक स्नानयम तर्पणउल्का
दान व प्रदर्शनदीप प्रज्वलन अभ्यंग स्नान —
क्यों सूर्योदय से
पहले?
मान्यता है कि
नरकासुर वध के बाद स्वयं श्रीकृष्ण ने ब्रह्ममुहूर्त में तेल स्नान कर शरीर को
शुद्ध किया था। इसीलिए इस दिन सूर्योदय से पहले तिल के तेल से अभ्यंग स्नान किया
जाए, क्योंकि
यह नरकासुर वध के पश्चात स्वयं श्री कृष्ण ने ब्रह्म मुहूर्त में तेल स्नान कर
शरीर पर लगे रक्त के कणों को शुद्ध किया था।
विधि: ब्रह्ममुहूर्त
में उठें, तिल के तेल की मालिश करें,
उबटन —
हल्दी,
चंदन,
बेसन,
अपामार्ग —
लगाएँ,
फिर स्नान करें।लाभ:
शरीर की शुद्धि, रूप-तेज में वृद्धि, मन की प्रसन्नता। इसीलिए इसे रूप चौदस कहते हैं।
यम दीपदान —
अकाल मृत्यु के भय
से मुक्ति
संध्या के समय घर के
बाहर, मुख्य
द्वार पर, दक्षिण दिशा में यमराज के निमित्त दीपदान करने से व्यक्ति
अकाल मृत्यु के भय से मुक्त होता है और परिवार में सुख-शांति बनी रहती है।विधि:
मिट्टी के दीये में सरसों का तेल, चार बाती, दक्षिण दिशा में रखें, यमराज को प्रणाम करें।
14 दीये: कई घरों में 14 दीये जलाए जाते हैं — नरक के 14 द्वारों से मुक्ति का प्रतीक।
काली चौदस और हनुमान
पूजा
इसी दिन माँ काली और
हनुमान जी की पूजा का भी विशेष महत्व है।
गुजरात-राजस्थान में
काली चौदस को तंत्र-साधना और नकारात्मक शक्ति से रक्षा का दिन माना जाता है।
हनुमान जी की पूजा बल, निर्भयता और संकट-मोचन के लिए की जाती है।
9. आज के जीवन में संदेशआंतरिक शुद्धि: अहंकार,
क्रोध,
लोभ जैसे आंतरिक
अंधकार को त्यागना।बाह्य शुद्धि: घर की सफाई, शरीर की शुद्धि, स्वच्छता ही दीपावली का मूल आधार है।नारी सम्मान: 16,000 बंदी कन्याओं की मुक्ति —
अन्याय के विरुद्ध
खड़े होने की प्रेरणा।प्रकाश का संकल्प: एक दीया बाहर और एक दीया मन के भीतर
जलाना।
सरल पूजा विधि —
एक नजर मेंसुबह:
ब्रह्ममुहूर्त में उठें, तिल तेल मालिश + उबटन + अभ्यंग स्नान,
नए वस्त्र।दिन में:
श्रीकृष्ण, सत्यभामा, हनुमान, काली माँ की पूजा, दान।शाम: घर में 14 दीये, मुख्य द्वार पर रंगोली,
यम दीपदान दक्षिण
दिशा में। रात: परिवार के साथ आरती, प्रसाद, दीपमाला।
शुभ नरक चतुर्दशी की
हार्दिक शुभकामनाएँ
त्रिग्रही पोस्टर के
नीचे अब पानी पर तैरते दीयों की सुंदर पंक्ति जोड़ दी है।
Trigrahi poster glow brighter with
golden reflections
त्रिग्रही पोस्टर के
तैरते दीये अब और ज़्यादा चमक रहे हैं, पानी पर सुनहरी परछाई के साथ।
त्रिग्रही पोस्टर
में अब पूरा चमकता हुआ पूर्णिमा का चाँद लगा दिया है।
प्रयत्न व साभार
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