सब कुछ लूटाकर अब भी बेहोशी से भाषावाद के नगाड़े से सत्तावाद का स्वप्न देखने का मंसूबा देखने वाले “उद्धवराज” का समय तो चुनाव चिह्न समाप्त होकर बुझी मशाल को धुएँ से “तेल के इंजन का धुँआ” दिखाकर अब जनता को रिझाने का यह छद्म खेल है
डूबते को तिनके का सहारा.., अब चुनाव में कोई नही होगा व्यारा - न्यारा ,
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“सब कुछ लुटाकर “ अब भी बेहोशी में भाषावाद के नगाड़े से सत्तावाद का स्वप्न देखने का मंसूबा देखने वाले “उद्धवराज” का समय तो चुनाव चिह्न समाप्त होकर बुझी मशाल को धुएँ से “तेल के इंजन का धुँआ” दिखाकर अब जनता को रिझाने का दोनों भाइयों यह छद्म खेल है
डूबते को तिनके का सहारा.., अब चुनाव में कोई नही होगा व्यारा - न्यारा
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The last resort for a drowning man is to cling to the straw of linguistic chauvinism...!!
प्रयत्न व साभार
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