Thursday, 14 October 2021

दोस्तों.. यह है समीर वानखेड़े का परिचय जो अपने प्रचार के लिए नहीं व देश की मीडिया, राजनेता, नौकरशाही, जजशाही को बता कर एक संदेश दिया हैं की सरकारी वेतन, वतन को बचाने के लिए काफ़ी हैं.. क्या नव पीढ़ी समीर वानखेड़े के विचारों से देश को उन्नत , सिरमौर से विश्व गुरु बनाने में प्रेरित से गर्वित होंगें…

 


समीर, बयार, मंद पवन…,


 

समीर दिल से अमीर एक बयार देश के हर समस्या को चुनौती देकर लड़ने को तैय्यार.. देश के मंद पवन में ज़हर घोलने वाले माफ़ियाओं को आँधी बनकर व देश की गंदी राजनीति में तूफ़ान बनकर एक अरमान से संहार का मेरा फ़रमान..

 


मेरी आत्मा देश के लिए फड़कती है जिसे अनैतिक धनलोलुप्त समाज के पिस्सूओ व देश को बाहरी भीतरी मफ़ियाओं के संगठन से देश को खंडित कर..मीडिया द्वारा महामंडित करने के परदे के पीछे का खेला जो अलबेला है इस बला के बाल को जड़ से उखाड़ने का प्रबल संकल्प है

 

दोस्तों.. यह है समीर वानखेड़े का परिचय जो अपने प्रचार के लिए नहीं व देश की मीडिया, राजनेता, नौकरशाही, जजशाही को बता कर एक संदेश दिया हैं की सरकारी वेतन,  वतन को बचाने के लिए काफ़ी हैं..

 

क्या नव पीढ़ी समीर वानखेड़े के विचारों से देश को उन्नत , सिरमौर से विश्व गुरु बनाने में प्रेरित से गर्वित होंगें

 

दोस्तों..., समीर वानखेड़े ने दिखा दिया है कि फ़िल्मों में २० करोड़ रुपये से अधिक लेने व जनता के पैसे से, नई पीढ़ी से मिलकर एक समानांतर ड्रग के खेल से घाल मेल कर २५०० करोड़ की अक़ूत संपत्ति जमा कर खुद को KING कहने का प्रचार करनेवाला जो बार –बार पाकिस्तान भागने की धमकी देने वाला शाहरुख़ नही…!!!

 

यही नही अमिताभ बच्चन ने पनामा पेपर लीक मे घपला कर देश को भारी चूना लगाया है व देश का धोकेबाज है इसके बावजूद प्रधानमंत्री काले धन वापसी की गुहार लगा रहें है व यदि इस मामले को समीर वानखेडे को सुपुर्द करें तो अमिताभ बच्चन भी पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाब शरीफ की तरह जेल जाने से पहिले  देश छोड़ कर भाग जाएंगे

 

देश का दहाड़ू शेर, इस ड्रग के जंगल राज का ख़ात्मा करने वाला ज़ुनूनी तो समीर वानखेड़े है व देशवासी गर्वित है।

क्या अब यह मुकदमा किला कोर्ट से सत्र न्यायालय के सत्रों में  फिरता रहेगा या न्यायशाही द्वारा कड़े संदेश से  माफियाओं को ड्रूग के डर से देश का दर्द खत्म हो जाएगा व देश खुशहाली में रहेगा


Tuesday, 12 October 2021

TATA अब BYE-BYE (अलविदा) नही॥, 1953 में नेहरू सरकार ने इसका अधिग्रहण किया कर इस विमानन सेवा को टाटा (अलविदा ) कह दिया था, आज भी टाटा लुटेरों द्वारा ध्वस्त कंपनियो को BUY – BUY (खरीदने) का जज्बा रखता है ... TATA GROUP तुम्हें सलाम॥, देश के बेलगाम माफिया नेताओं का अब देशवासी नही बनेगा गुलाम.


 

TATA को सरकार ने  AIR INDIA  तब बेचा जब सरकार के पास दमड़ी नही थी कर्मचारियों के घर का आटा खतम हो रहा था ...

60 हजार करोड़ से अधिक कर्ज से हवा में  विमान में ऑक्सिजन न होने से वेंटिलेटर से दस हजाए से अधिक कर्मचारियों को काम से छुट्टी के लेटर की अंतिम नौबत आ गई थी

 

पिछले 15 सालों में छोटालेबाजों की सूची में 10 हजार करोड़ के कर्ज व घोटालों में किंग फिशर के विजय मालिया का नाम उजागर हुआ

तब से AIR INDIA को लूटने की साजिश से भ्रष्टाचार की माचिस से धुआँ कर देश का पैसा हवा में उड़ाकर राजनीति में 6 नए मालयाओं का जन्म हो कर 60 हजार करोड़ से अधिक की राशि डकार कर AIR INDIA को एक बरमूडा ट्रेगल (जजशाही नौकरशाही लूटशाही के गठबंधन) से इस घोटाले को छिपा कर गायब कर दिया है

 

देश के गौरव का प्रतीक महाराजा अंतिम सांसे ले रहा था॥!!!,

 

याद रहे 70 के दशक में दुनिया में सबसे सुरक्षित व प्रतिष्ठित विमानन सेवा में महाराजा की मुस्कान व ऊंची मूँछों के रौनक से विश्व में AIR INDIA के विमान अपहरण की घटना शून्य थी

यह तो राष्ट्रवादी TATA GROUP  का देश को  एहसान मानना चाहिये की जिनहोने 18 हजार करोड़ में इस  घाटे का सौदे में हाथ डालकर इस विमानन सेवा को मुनाफे में लाने का जो बीड़ा उठाया है उसमें जरूर सफलता मिलेगी क्योंकि अब तक यह राज नेताओं के लिए भ्रष्टाचार से विशाल धन कमाने का आसान जरिया था

TATA अब BYE-BYE (अलविदा) नही॥,  1953 में नेहरू सरकार ने इसका अधिग्रहण किया कर  इस विमानन सेवा को टाटा (अलविदा ) कह दिया था, आज भी टाटा लुटेरों द्वारा ध्वस्त कंपनियो को BUY – BUY (खरीदने) का जज्बा रखता है ...  

TATA GROUP तुम्हें सलाम॥, देश के बेलगाम  माफिया नेताओं का अब देशवासी  नही बनेगा गुलाम.


 

 


Saturday, 14 August 2021

अब १५ अगस्त स्वतंत्रता दिवस के पूर्व देश को खिलाड़ियों का उपहार ओलम्पिक खेल की सुबह में चाँदी व अन्य दिनों में कांस्य व सूर्यास्त में सोने के मेडल से गौरान्वित करने वाले देश के खिलाड़ियों को मेरा सलाम... अब देश की प्रतिभाएँ नही रहेंगी ग़ुलाम..., देश बनेगा प्रतिभावान

 

अब १५ अगस्त स्वतंत्रता दिवस के पूर्व देश को खिलाड़ियों का उपहार

ओलम्पिक खेल की सुबह में चाँदी व अन्य दिनों में कांस्य व सूर्यास्त में सोने के मेडल से गौरान्वित करने वाले देश के खिलाड़ियों को मेरा सलाम...

अब देश की प्रतिभाएँ नही रहेंगी ग़ुलाम..., देश बनेगा प्रतिभावान




Sunday, 8 August 2021

८ अगस्त १९४२ भारत तोड़ो दिवस...., जिन्ना के DIRECT ACTION दिवस की नीव पढ़ गई व कवि इकबाल के झण्डा ऊंचा रहे हमारा तिरंगा को हरे रंग के सल्तनत बनाने के पहिले 1943 को अल्लाह को प्यारे हो गए … वीर परमवीर दामोदर सावरकर की दमदार भविष्यवाणी 14th अगस्त 1947 को सार्थक हुई ...


 

इस लेख के पहिले 5 अगस्त को कश्मीर जोड़ों दिवस धारा 370 व 35 (A) को धवस्त करने की  दूसरी वर्ष गांठ के लिए इस अविस्मरणीय दिवस के उपलक्ष्य  में हमारे सम्माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बहुत –बहुत  बधाई ...

 

  अगस्त १९४२ भारत तोड़ो दिवस...., जिन्ना के DIRECT  ACTION दिवस  की नीव पढ़ गई   कवि इकबाल के झण्डा ऊंचा रहे हमारा  तिरंगा को हरे रंग के सल्तनत बनाने के पहिले 1943 को  अल्लाह को प्यारे हो गए

 

वीर परमवीर दामोदर सावरकर की दमदार  भविष्यवाणी 14th अगस्त 1947 को सार्थक हुई ...

 

८ अगस्त  १९४२ अखंड भारत के इतिहास का विश्वास घातक दिवस .,यह “भारत छोड़ों” आन्दोलन नहींभारत तोड़ों” आन्दोलन है तुम्हारी तिकड़ी अखंड भारत के साथ धोखा है तुष्टिकरण से सत्तालोलुपता के “अखंड भारत” को “खंडित भारत” से देशवासियों को एक गंदी राजनीती से देश को गर्त में ले जाएगा – वीर सावरकर

 

  जून १९४२ अखंड भारत के इतिहास का घातक दिवसकी ७६ वी बरसी ,देश के डाकुओं द्वारा तुष्टिकरण के अस्त्र से देश को खंडित करने का बीजोरोपण साबित हुआ ... पतंजली के ज्ञाता वीर ही नहीं परमवीर सावरकर की यह ४० से अधिक भविष्यवाणी वाणियों में यह एक सटीक भविष्य वाणी है.

 

१.             ये गांधी की ही देंन थी किभारत सरकार पर ५५ करोड़ रु. पाकिस्तान को देने का दबाव डालामाउंटबैटन ने गांधीजी को पाकिस्तान को ५५ करोड़ रु. दिलवाने की सलाह दी. २२ अक्तूबर १९४७ को पाकिस्तान ने कश्मीर पर आक्रमण किया. कश्मीर में युद्ध चलाए रखने के लिए उसे धन की सख्त जरुरत थी. गांधीजी ने पाकिस्तान को ५५ करोड़ रूपए रोकड़ राशि में से दिलवाने के लिएनेहरु और पटेल पर दबाव डालने हेतुआमरण उपवास आरम्भ किया. अन्ततोगत्वानेहरु और पटेल उपर्युक्त राशी पाकिस्तान को देने को विवश हुएयद्यपि बाद में पाकिस्तान को इससे भी अधिक धन-राशी भारत को देनी थी. जो आज तक नहीं मिली

२.            गांधी ने भारत – विभाजन कराने वाली भयंकर भूलों के तो बीज बो दिए थे
विघटन के बीज लखनऊ-पैक्ट (समझौते) मेंजब कांग्रेस ने लखनऊ पैक्ट में दो विषाक्त सिद्धांत स्वीकार किए : पहला ,संप्रदाय के आधार पर मुसलमानों को प्रतिनिधित्वतथा मुस्लिम लीग को भारत के सभी मुसलमानों की प्रतिनिधि संस्था मान्य.,सिद्धांत रूप में तो कांग्रेस द्वी राष्ट्रवाद को अस्वीकार करती थीपरन्तु व्यवहार में उसने लखनऊ-पैक्ट के रूप में उसे मान लिया क्योकि इसमें मुसलमानों की लिए पृथक मतदान स्वीकार किया गया था. इस प्रकार इस पैक्ट में विभाजन का बीज बोया गया.
 हिंदुस्थान के प्रतिनिधि तीन कट्टर मुसलमान थेमार्च १९४६ में ब्रिटिश सरकार के मंत्रिमंडल के तीन सदस्यसर स्टैफोर्ड क्रिप्समि.ए.वी. अलेग्जेंडर और लार्ड पैथिक लारेंस वार्ता और विचार-विमर्श के लिए भारत आए. हिन्दुओ की पूण्य भूमि हिंदुस्थान का प्रतिनिधित्व तीन कट्टर मुसलमानों ने किया. भारतीय कांग्रेस और हिंदुस्थान के समस्त हिन्दुओ के प्रतिनिधि थे कांग्रेस अध्यक्ष मौलाना अबुल कलाम आजाद. .मुहम्मद अली जिन्नामुस्लिम लीग के अध्यक्ष , हिंदुस्थान के मुसलमानों के प्रतिनिधि थे! नवाब भोपाल ने भारत की देसी रियासतों के शासको का प्रतिनिधित्व किया. ब्रिटिश सरकार की ओर से तीन ईसाई और हिंदुस्थान की ओर से तीन मुसलमान हिंदुस्थान के ७७ प्रतिशत हिन्दुओ के भाग्य का निर्णय करने को बैठे.

 

३. कांग्रेस ने हिन्दू मतदाताओं को धोखा दिया,जब.. कांग्रेसियों ने १९४६ का निर्णायक चुनावअखंड भारत ’के नाम पर लड़ा था. बहुमत प्राप्त करने के बाद ,उन्होंने पाकिस्तान के कुत्सित प्रस्ताव को मान कर हिन्दू मतदाताओ के साथ निर्लज्जतापूर्वक विश्वासघात किया. वीर सावरकर ने उनकी भर्त्सना की कि जब उन्होंने निर्लज्ज होकर अपना सिद्धांत बदला हैऔर अब वे हिन्दुस्तान के विभाजन पर सहमत हो गए हैतो या तो वे अपने पदों से त्यागपत्र दे और स्पष्ट पाकिस्तान के मुद्दे पर पुन: चुनाव लड़े या मातृभूमि के विभाजन के लिए “जन-मत ” कराएं .

 

४. कांग्रेसियों ने विभाजन क्यों स्वीकार किया?इसमें गांधी की अहम छद्म अहिंसा का मूल मंत्र था,कांग्रेसियों ने मुस्लिम लीग द्वारा भड़काए कृत्रिम दंगो से भयभीत होकर जिन्ना के सामने कायरता से घुटने टेक दिए .यदि दब्बूपनआत्म-समर्पणघबराहट और मक्खनबाजी के जगह वे मुस्लिम लीग के सामने अटूट दृढ़ता तथा अदम्य इच्छा शक्ति दिखातेतो जिन्ना पाकिस्तान का विचार छोड़ देता. लिआनार्ड मोस्ले के अनुसार पंडित नेहरु ने इमानदारी के साथ स्वीकार किया कि बुढापे ,दुर्बलता ,थकावट और निराशा के कारण उनमे विभाजन के कुत्सित प्रस्ताव का सामना करने के लिए एक नया संघर्ष छेड़ने का दम नहीं रह गया था.उन्होंने सुविधाजनक कुर्सीयों पर उच्च पद-परिचय के साथ जमे रहने का निश्चय किया. इस प्रकार राजनितिक-सत्तासम्मान और पद के लालच से आकर्षित विभाजन स्वीकार कर लिया.

 

५. क्या दंगे रोकने का उपाय केवल विभाजन ही था?, सरदार पटेल गांधीजी के पिंजरे में बंद एक शेर थे. उन्हें दंगाइयों के साथ “जैसे को तैसाघोषणा करने के लिए खुली छूट नहीं थीइसलिए उन्होंने क्षुब्ध होकर कहा था, “ये दंगे भारत में कैंसर के सामान है. इन दंगो को सदा के लिए रोकने के लिए एक ही इलाज ‘विभाजन ’है”. यदि आज सरदार पटेल जीवित होतीतो वे देखते की दंगे विभाजन के बाद भी हो रहे है. क्योंक्योंकि जनसँख्या के अदल-बदल बिना विभाजन अधूरा था.

 

६. जनसंख्या के अदल-बदल बिना विभाजन का गांधी ने सुखाव ठुकरा दिया.. यदि ग्रीस और टर्की ने ,साधनों के सिमित होते हुए भी ,ईसाई और मुस्लिम आबादी का अदल-बदल कर के,मजहबी अल्पसंख्या की समस्या का मिलजुल कर समाधान कर लिया ,तो विभाजन के समय में हिन्दुस्तान में ऐसा क्यों नहीं किया गयाखेद है की पंडित नेहरु के नेतृत्व में कांग्रेसी नेताओ ने इस संबंध में डा. भीमराव आंबेडकर के सूझ्भूझ भरे सुझाव पर कोई ध्यान नहीं दिया. जिन्ना ने भी हिन्दू-मुस्लिम जनसँख्या की अदला-बदली का प्रस्ताव रखा था. परन्तु मौलाना आजाद के पंजे में जकड़ी हुई कांग्रेस ने नादानी के साथ इसे अस्वीकार कर दिया. कांग्रेसी ऐसे अदूरदर्शी थे कि उन्होंने यह नहीं सोचा कि जनसंख्या की अदला-बदली बिना खंडित हिंदुस्थान में भी सांप्रदायिक दंगे होते रहेंगे.

 

७. पाकिस्तान को अधिक क्षेत्रफल दिया गया,१९४६ के निर्णायक आम चुनाव मेंअविभाजित हिंदुस्थान के लगभग सभी (२३%) मुसलमनो ने पाकिस्तान के लिए वोट दिया ,परन्तु भारत के कुल क्षेत्रफल का ३०% पाकिस्तान के रूप में दिया गया. दुसरे शब्दों में उन्होंने अपनी जनगणना की अनुपात से अधिक क्षेत्रफल मिला ,यह जनसंख्या भी बोगस थी. फिर भी सारे मुस्लिम अपने मनोनीत देश में नहीं गए.

 

८. झूठी मुस्लिम जन-गणना के आधार पर विभाजन का आधार मानाकांग्रेस ने १९४९ तथा १९३१ दोनों जनगणनाओ का बहिष्कार किया. फलत:मुस्लिम लीग ने चुपके-चुपके भारत के सभी मुसलमानों को उक्त जनगणनाओ में फालतू नाम जुडवाने का सन्देश दिया. इसे रोकने वाला या जाँच करने वाला कोई नहीं था. अत: १९४१ की जनगणना में मुसलमानों की संख्या में विशाल वृद्धि हो गई. आश्चर्य की बात है कि कांग्रेसी नेताओं ने स्वच्छा से १९४१ की जनगणना के आंकड़े मान्य कर लिएयद्यपि उन्होंने उसका बहिष्कार किया था. उन्ही आंकड़ा का आधार लेकर मजहब के अनुसार देश का बटवारा किया गया. इस प्रकार देश के वे भाग भी जो मुस्लिम बहुल नहीं थे,पाकिस्तान में मिला दिए गए.

 

९. स्वाधीन भारत का अंग्रेज गवर्नर जनरल की सहमती दी....,गांधीजी और पंडित नेहरु के नेतृत्व में कांग्रेस ने मुर्खता के साथ माऊंट बैटन को दोनों उपनिवेशोंहिंदुस्थान और पाकिस्तान का गवर्नर जनरलदेश के विभाजन के बाद भी मान लिया. जिन्ना में इस मूर्खतापूर्ण योजना को अस्वीकार करने की बहुत समझ थी. अत: उसने २ जुलाई १९४७ को पत्र द्वारा कांग्रेस और माऊंट बैटन को सूचित कर दिया की वह स्वयं पाकिस्तान का गवर्नर जनरल बनेगा.परिणाम यह हुआ की माऊंट बैटन स्वाधीन खंडित बहरत के गवर्नर जनरल नापाक-विभाजन के बाद भी बने रहे.

 

१०. सीमा-आयोग का अध्यक्ष अंग्रेज पदाधिकारी को मनोनीत किया गया ,माऊंट बैटन के प्रभाव में,गांधीजी और पंडित नेहरु ने पंजाब और बंगाल के सीमा आयोग के अध्यक्ष के रूप में सीरिल रैड क्लिफ को स्वीकार कर लिया.सीरिल रैडक्लिफ जिन्ना का जूनियर (कनिष्ठ सहायक) थाजब उसने लन्दन में अपनी प्रैक्टिस आरम्भ की थी. परिणाम स्वरुपउसने पाकिस्तान के साथ पक्षपात और लाहौरसिंध का थरपारकर जिला,चटगाँव पहाड़ी क्षेत्रबंगाल का का खुलना जिला एवं हिन्दू-बहुल क्षेत्र पाकिस्तान को दिला दिये

११. बंगाल का छल-पूर्ण सीमा निर्धारण किया गया,भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की उदासीनता के कारण ४४ प्रतिशत बंगाल के हिन्दुओ को ३० प्रतिशत क्षेत्र पश्चिमी बंगाल के रूप में संयुक्त बंगाल में से दिया गया.५६ प्रतिशत मुसलमानों को ७० प्रतिशत क्षेत्रफल पूर्वी पाकिस्तान के रूप में मिला.
चटगाँव पहाड़ी क्षेत्र जिसमे ९८ प्रतिशत हिन्दू-बौद्ध रहते है,एवं हिन्दू-बहुल खुलना जिला अंग्रेज सीमा-निर्धारण अधिकारी रैडक्लिफ द्वारा पाकिस्तान को दिया गया.कांग्रेस के हिन्दू नेता ऐसे धर्मनिरपेक्ष बने रहे की उन्होंने अन्याय के विरुद्ध मुँह तक नहीं खोला.

 

१२. सिंध में धोखे भरा सीमा-निर्धारण कियाजब सिंध के हिन्दुओ ने यह मांग की की सिंध प्रान्त का थारपारकर जिला जिसमे ९४ प्रतिशत जनसँख्या हिन्दुओ की थी,हिंदुस्थान के साथ विलय होना चाहिए,तो भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस ने सिन्धी हिन्दुओ की आवाज इस आधार पर दबा दी की देश का विभाजन जिलानुसार नहीं किया जा सकता.परन्तु जब आसाम के जिले सिल्हित की ५१ प्रतिशत मुस्लिम आबादी ने पकिस्तान के साथ जोड़े जाने की मांग की,तो उसे तुरंत स्वीकार कर लिया गया.
बोलू: मजहब के आधार पर विभाजन-धर्मनिरपेक्षता के विरुद्ध गांधी का खेल था... यदि गांधीजी पंडित नेहरु सच्चे धर्म-निर्पेक्षतावादी थे तो उन्होंने देश का विभाजन मजहब के आधार पर क्यों स्वीकार किया?

गांधी की आड़ में कांग्रेस में एक बड़ा खेल खेला , हिन्दू राज्य को ठुकराकर, जब गांधीजी और नेहरु ने देश का विभाजन मजहब के आधार पर स्वीकार किया, पाकिस्तान मुसलमानों के लिए और शेष बचा हिंदुस्थान हिंदूओ के लिए, तो उन्हें हिंदूओं को तर्कश: :द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत के अनुसार अपना हिन्दूराज्य स्थापित करने के अधिकार से वंचित नहीं करना चाहिए था .यह पंडित नेहरु ही थे जिन्होंने स्वेच्छाचारी तानाशाह के समान अगस्त १९४७ में घोषणा की थी कि जब तक वे देश की सरकार के सूत्रधार है,भारत “हिंदू राज्य” नहीं हो सकेगा. कांग्रेस के सभी हिंदू सदस्य इतने दब्बू थे कि इस स्वेच्छाचारी घोषणा के विरुद्ध एक शब्द भी बोलने की भी उनमें हिम्मत नहीं थी.

 


https://www.facebook.com/BapuKeTinaBandaraAbaBanaGayeHaiMa…/ 

फेस बुक व वेबस्थल की १७ जनवरी २०१४ की पुरानी व आज भी सार्थक पोस्ट 


बोलू: गांधी की आड़ में कांग्रेस में एक बड़ा खेल खेला , हिन्दू राज्य को ठुकराकरजब गांधीजी और नेहरु ने देश का विभाजन मजहब के आधार पर स्वीकार कियापाकिस्तान मुसलमानों के लिए और शेष बचा हिंदुस्थान हिंदूओ के लिएतो उन्हें हिंदूओं को तर्कश: :द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत के अनुसार अपना हिन्दूराज्य स्थापित करने के अधिकार से वंचित नहीं करना चाहिए था .यह पंडित नेहरु ही थे जिन्होंने स्वेच्छाचारी तानाशाह के समान अगस्त १९४७ में घोषणा की थी कि जब तक वे देश की सरकार के सूत्रधार है,भारत “हिंदू राज्य” नहीं हो सकेगा. कांग्रेस के सभी हिंदू सदस्य इतने दब्बू थे कि इस स्वेच्छाचारी घोषणा के विरुद्ध एक शब्द भी बोलने की भी उनमें हिम्मत नहीं थी.

 


सुनू: असांविधानिक धर्मनिरपेक्षतावाद के आड़ में कांग्रेस ने देश को धोखा दियाजब खंडित हिंदुस्थान को “हिंदू राज्य” घोषित करने के स्थान पर सत्ताधारी छद्म धर्मनिरपेक्षतावादीयों ने धूर्तता के साथ धर्मनिरपेक्षतावाद को ,१९४६ तक अपने संविधान में शामिल किये बिना हीहिन्दुओं की इच्छा के विरुद्ध राजनीति में गुप्त रूप से समाहित कर दिया.

 

बोलू : धर्म-निरपेक्षता एक विदेशी धारणा से वाहवाही बटोरने का खेल खेला ,यद्यपि गांधीजी और नेहरु “स्वदेशी के मसीहा” होने की डींगे मारते थेतथापि उन्होंने विदेशी राजनितिक धारणा ‘धर्म-निरपेक्षता’ का योरप से आयात कियायद्यपि यह धारणा भारत के वातावरण के अनुकूल नहीं थी.



देखू: धर्मविहीन धर्मनिरपेक्षता को पाखण्ड बनाया,यदि इंग्लॅण्ड और अमेरिकाईसाइयत को राजकीय धर्म घोषित करने के बाद भीविश्व भर में धर्म-निरपेक्ष माने जा सकते है,तो हिंदुस्थान को हिंदुत्व राजकीय धर्म घोषित करने के बाद भी,धर्म-निरपेक्ष क्यों नहीं स्वीकार किया जा सकता?पंडित नेहरु द्वारा थोपा हुआ धर्म-निरपेक्षतावाद धर्म-विहीन और नकारात्मक है.

 

देखू: इसी की आड़ में पूर्वी पाकिस्तान (बंगला देश) में हिन्दुओं का नरसंहार बेरहमी से हुआ और १९४७ में,पूर्वी पाकिस्तान मेंहिंदुओं की जनसंख्या कुल आबादी का ३० प्रतिशत (बौद्धों सहित) अर्थात डेढ़ करोड़ थी. ५० वर्षो में अर्थात १९४७ से १९९७ तक इस आबादी का दुगना अर्थात ३ करोड़ हो जाना चाहिए था.परन्तु तथ्य यह है कि वे घट कर १ करोड़ २१ लाख अर्थात कुल आबादी का १२ प्रतिशत रह गये है.१९५० में ५० हजार हिंदुओं का नरसंहार किया गया. १९६४ में ६० हजार हिन्दू कत्ल किये गए. १९७१ में ३० लाख हिन्दूबौद्ध तथा इसाई अप्रत्याशित विनाश-लीला में मौत के घाट उतारे गए. ८० लाख हिंदुओं और बौद्धों को शरणार्थी के रूप में भारत खदेड़ दिया गया. हिंदुस्थान के हिन्दू सत्ताधारियो द्वारा हिंदुओं को इस नरसंहार से बचने का कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया.

 

बोलू: हमारे देश में कांग्रेस ने हिदू विस्थापितों की उपेक्षा की गईयदि इज्रायल का ‘ला ऑफ़ रिटर्नप्रत्येक यहूदी को इज्रायल में वापिस आने का अधिकार देता है. प्रवेश के बाद उन्हें स्वयमेवनागरिकता’ प्राप्त हो जाती है.परंतु खेद है की हिन्दुस्थान के छद्म-धर्मनिरपेक्ष राजनितिक सत्ताधारी उन हिदुओं को प्रवेश करने पर अविलंब नागरिकता नहीं देतेजो विभाजन के द्वारा पीड़ित हो कर और पाकिस्तान तथा बांग्लादेश में अत्याचार से त्रस्त होकर भारत में शरण लेते है.

 

देखू: नेहरु ने लियाकत समझौता का नाटक खेलाजब विभाजन के समय कांग्रेस सरकार ने बार बार आश्वासन दिया था कि वह पाकिस्तान में पीछे रह जाने वाले हिंदुओं के मानव अधिकारों के रक्षा के लिए उचित कदम उठाएगी परन्तु वह अपने इस गंभीर वचनबद्धता को नहीं निभा पाई. तानाशाह नेहरु ने पूर्वी पकिस्तान के हिंदुओं और बौद्धों का भाग्य निर्माण निर्णय अप्रैल ८ १९५० को नेहरु लियाकत समझौते के द्वारा कर दिया उसके अनुसार को बंगाली हिंदू शरणार्थी धर्मांध मुसलमानों के क्रूर अत्याचारों से बचने के लिए भारत में भाग कर आये थेबलात वापिस पूर्वी पाकिस्तान में बंगाली मुसलमान कसाई हत्यारों के पंजो में सौप दिए गए
.
बोलू: हां लियाकत अली के तुष्टिकरण के विरोध कने के लिए लिए वीर सावरकर गिरफ्तार कर लियाजब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली खान को पंडित नेहरु द्वारा दिल्ली आमंत्रित किया गया तो छद्म धर्मनिरपेक्षतावादी कृतघ्न हिन्दुस्थान सरकार ने नेहरु के सिंहासन के तले,स्वातंत्र वीर सावरकर को ४ अप्रैल १९५० के दिन सुरक्षात्मक नजरबंदी क़ानून के अन्दर गिरफ्तार कर लिया और बेलगाँव जिला कारावास में कैद कर दिया.पंडित नेहरु की जिन्होंने यह कुकृत्य लियाकत अली खान की मक्खनबाजी के लिए कियालगभग समस्त भारतीय समाचार पत्रो ने इसकी तीव्र निंदा की. लेकिन नेहरू के कांग्रेसी अंध भक्तों ने कोई प्रतिक्रया नहीं की

 

देखू१९७१ के युद्ध के बाद , हिंदू शरणार्थियो को बलपूर्वक बांग्लादेश वापिस भेजा
श्रीमती इंदिरा गाँधी की नेतृत्व वाली हिन्दुस्थान सरकार ने बंगाली हिंदूओं और बौद्ध शर्णार्थियो को बलात अपनी इच्छा के विरुद्ध बांग्लादेश वापिस भेजा.इनलोगो ने इतना भी नहीं सोचा कि वे खूंखार भूखे भेडीयो की मांद में भेडो को भेज रहे है.

 

बोलू: बंगलादेशी हिंदुओं के लिए अलग मातृदेश की मांग को इंदिरा गांधी ने अपने दुर्गा देवी की छवि को आंच न आये , इसलिए वह भी अपने निहित स्वार्थों की वजह से इसे अनदेखा कर दिया

सूनू: यह आज तक कांग्रेस का दुग्गला पण रहा है,एक तरफ तो , यदि हिन्दुस्थान की सरकार १० लाख से भी कम फिलिस्थिनियो के लिए संयुक्त राष्ट्रसंघ में एक अलग मातृभूमि का प्रस्ताव रख सकती है तो वह २० लाख बंगाली हिंदुओं और बौद्धों के लिए जो बांग्लादेश के अन्दर और बाहर नारकीय जीवन बिता रहे है उसी प्रकार का प्रस्ताव क्यों नहीं रख सकती.

 

देखू: इसके पहले कि और एक विडबन्ना , जो बांग्लादेश के ‘तीन-बीघा’ समर्पण कर दियाजब
१९५८ के नेहरु-नून पैक्ट (समझौते) के अनुसार अंगारपोटा और दाहग्राम क्षेत्र का १७ वर्ग मिल क्षेत्रफल जो चारो ओर से भारत से घिरा था,हिन्दुस्थान को दिया जाने वाला था .हिन्दुस्थान की कांग्रेसी सरकार ने उस समय क्षेत्र की मांग करने के स्थान पर १९५२ में अंगारपोटा तथा दाहग्राम के शासन प्रबंध और नियंत्रण के लिए बांग्लादेश को ३ बीघा क्षेत्र ९९९ वर्ष के पट्टे पर दे दिया.

 

बोलू: लेकिनअब तो वोट बैंक के तुष्टीकरण की भी कांग्रेस ने सभी हदें पार कर दी , जब केरल में लघु पाकिस्तानमुस्लिम लीग की मांग पर केरल की कम्युनिस्ट सरकार ने तीन जिलोत्रिचूर पालघाट और कालीकट को कांट छांट कर एक नया मुस्लिम बहुल जिला मालापुरम बना दिया .इस प्रकार केरल में एक लघु पाकिस्तान बन गया. केंद्रीय सरकार ने केरल सरकार के विरुद्ध कोई कदम नहीं उठाया.


आयें ...हम प्रतिज्ञा ले.. इस राष्ट्रवादी धागे को और मजबूत बनाएं...


Let's not make a party but become part of the country. I'm made for the country and will not let the soil of the country be sold. के संकल्प से गरीबी हटकरभारत निर्माण सेइंडिया शायनिंग सेहमारे LONG – INNINGसे, “FEEL GOOD FACTOR” से देश के अच्छे दिन आयेंगें..,

साभार
www.meradeshdoooba.com (a mirror of india) स्थापना २६ दिसम्बर २०११ कृपया वेबसाइट की ७००  प्रवाष्ठियों की यात्रा करें व E MAIL द्वारा नई पोस्ट के लिए SUBSCRIBE करें - भ्रष्टाचारीयों के महाकुंभ की महान-डायरी


Friday, 30 July 2021

यह चित्र मोदीजी, भारतमाता व राष्ट्र को समर्पित अब अंग्रेजी नही बनेगी राष्ट्र के युवाओं को रोटी देने वाली भ्रम की भाषा..., देश को जकड़ने वाली अंग्रेजी भाषा की देशी व क्षेत्रीय भाषाओं के प्रभुत्व से अब देश की बेड़ियाँ टूटेगी.... अब देश में उच्च शिक्षा 11 देशी भाषाओं में


 यह चित्र मोदीजी, भारतमाता व राष्ट्र को समर्पित

अब अंग्रेजी नही बनेगी राष्ट्र के युवाओं को रोटी देने वाली भ्रम की भाषा..., देश को जकड़ने वाली अंग्रेजी भाषा की  देशी व क्षेत्रीय भाषाओं के प्रभुत्व से अब देश की बेड़ियाँ टूटेगी....

अब देश में उच्च शिक्षा 11 देशी भाषाओं में

याद रहे .....

भारतेंदु हरिश्चंद्र मात्र 34 साल जीवन जीने वाले जो साहित्यकारपत्रकारकवि और नाटककार थे  1850 के आसपास के भारत में भ्रष्टाचारप्रांतवादअलगाववादजातिवाद और छुआछूत जैसी समस्याएं अपने चरम पर थीं. तब उन्होने देश भर  में अपने नाट्य मंचों को हिन्दी व क्षेत्रीय भाषाओं से समाज की आँखें खोलने मेँ एक अहम भूमिका निभाई

 

जिन्होने विश्व को यही सार्थक उक्ति कही थी   संदेश दिया था कि मातृभाषा से ही देश की उन्नती है  

निज भाषा उन्नति अहैसब उन्नति को मूल।
बिन निज भाषा-ज्ञान केमिटत न हिय को सूल।।
विविध कला शिक्षा अमितज्ञान अनेक प्रकार।
सब देसन से लै करहूभाषा माहि प्रचार।।

निज यानी अपनी भाषा से ही उन्नति संभव हैक्योंकि यही सारी उन्नतियों का मूलाधार है।
मातृभाषा के ज्ञान के बिना हृदय की पीड़ा का निवारण संभव नहीं है।

विभिन्न प्रकार की कलाएँअसीमित शिक्षा तथा अनेक प्रकार का ज्ञान,
सभी देशों से जरूर लेने चाहियेपरन्तु उनका प्रचार मातृभाषा के द्वारा ही करना चाहिये।

 

भारतेंदु हरिश्चंद्र मात्र 34 साल जीवन जीने वाले जो साहित्यकार, पत्रकार, कवि और नाटककार थे 1850 के आसपास के भारत में भ्रष्टाचार, प्रांतवाद, अलगाववाद, जातिवाद और छुआछूत जैसी समस्याएं अपने चरम पर थीं. तब उन्होने देश भर में अपने नाट्य मंचों को हिन्दी व क्षेत्रीय भाषाओं से समाज की आँखें खोलने मेँ एक अहम भूमिका निभाई जिन्होने विश्व को यही सार्थक उक्ति कही थी संदेश दिया था कि मातृभाषा से ही देश की उन्नती है “ निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल। बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।। विविध कला शिक्षा अमित, ज्ञान अनेक प्रकार। सब देसन से लै करहू, भाषा माहि प्रचार।। ” निज यानी अपनी भाषा से ही उन्नति संभव है, क्योंकि यही सारी उन्नतियों का मूलाधार है। मातृभाषा के ज्ञान के बिना हृदय की पीड़ा का निवारण संभव नहीं है। विभिन्न प्रकार की कलाएँ, असीमित शिक्षा तथा अनेक प्रकार का ज्ञान, सभी देशों से जरूर लेने चाहिये, परन्तु उनका प्रचार मातृभाषा के द्वारा ही करना चाहिये।




यह चित्र मोदीजी, भारतमाता व राष्ट्र को समर्पित

अब अंग्रेजी नही बनेगी राष्ट्र के युवाओं को रोटी देने वाली भ्रम की भाषा..., देश को जकड़ने वाली अंग्रेजी भाषा की  देशी व क्षेत्रीय भाषाओं के प्रभुत्व से अब देश की बेड़ियाँ टूटेगी....

अब देश में उच्च शिक्षा 11 देशी भाषाओं में

याद रहे .....

भारतेंदु हरिश्चंद्र मात्र 34 साल जीवन जीने वाले जो साहित्यकार, पत्रकार, कवि और नाटककार थे  1850 के आसपास के भारत में भ्रष्टाचार, प्रांतवाद, अलगाववाद, जातिवाद और छुआछूत जैसी समस्याएं अपने चरम पर थीं. तब उन्होने देश भर  में अपने नाट्य मंचों को हिन्दी व क्षेत्रीय भाषाओं से समाज की आँखें खोलने मेँ एक अहम भूमिका निभाई

 

जिन्होने विश्व को यही सार्थक उक्ति कही थी   संदेश दिया था कि मातृभाषा से ही देश की उन्नती है  

निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।
बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।।
विविध कला शिक्षा अमित, ज्ञान अनेक प्रकार।
सब देसन से लै करहू, भाषा माहि प्रचार।।

निज यानी अपनी भाषा से ही उन्नति संभव है, क्योंकि यही सारी उन्नतियों का मूलाधार है।
मातृभाषा के ज्ञान के बिना हृदय की पीड़ा का निवारण संभव नहीं है।

विभिन्न प्रकार की कलाएँ, असीमित शिक्षा तथा अनेक प्रकार का ज्ञान,
सभी देशों से जरूर लेने चाहिये, परन्तु उनका प्रचार मातृभाषा के द्वारा ही करना चाहिये।

 

संक्षेप्त में अंग्रेजी भाषा जो देश को गुलाम रखने वाले अंग्रेजों के अंग्रेजों के पिल्लूओ ने  हिन्दी के साथ क्षेत्रीय भाषा जो देश की व क्रांतिकारियों की भाषा थी जिसे आज भी एक सुनोजियत षडयंत्र के तहत समाप्त किया जा रहा था उसकी समाप्ती का दौर आ गया है        

विदेशी भाषा को चंद लोग जानने वाले देश पर आज भी विदेशी राष्ट्रो के इशारों  से देश की राष्ट्रवाद व राष्ट्रनीती (धर्म परिवर्तन, घुसपैठियों  का संगठन से वोट बैंक बनाकर व देश का कायरता का  झूठा इतिहास पढ़ाकर देश को खंडित भारत की उपमा से देश के टुकड़े करने की नीती की योजना बना रहे थे ) बदलकर राजनीति की चासनी से देश पर राज कर देश को डूबाने का ही काम कर  रहें हैं  

सुदूर क्षेत्रीय भाषा के  गरीब तबकों  के अभिभावक भी भारी स्कूल फीस भरकर अपने बालकों को अंग्रेजी भाषा  में शिक्षण  देकर देश की मुख्य  धारा से अलग कर, वह छात्र मूक विदेशी भाषा का अनुसरण तो करता है पर वह उसके पल्ले नही पड़ता है

8वीं  कक्षा के बाद उसे अंग्रेजी भाषा के पल्ले पड़ने  का  एहसास होता है व मैट्रिक में पहुँचने तक वह भाषा का ज्ञान लेते रहता है

तब तक वह विदेशी भाषा के बोझ तले दबता हुआ शिक्षा का अधूरा ज्ञान ग्रहण करता है

विश्व के जिन देशों ने स्वदेशी भाषा में शिक्षा  का प्रसार किया है आज अंग्रेजी भाषा के देश उनसे पिछड़ते जा रहें है

जापान मेँ 10 वी का छात्र अपनी भाषा से आगे अनुसंधान के लिए पढ़ाई करता है जबकि हमारे देश का  छात्र रोजगार वाले क्षेत्र के लिए पढ़ाई में अपने को बंधुवा अफसर बनाने के लिए आतुर व गर्व में रहता है   

अपनी भाषा में अनुसरण कर अति उन्नत देशों में इस्राइल रूस फ्रांस जापान स्पेन पोलैंड जर्मनी स्विट्ज़रलैंड चीन डच इटली जैसे अनेक देश हैं

और हम हैं सत्ता परिवर्तन के 73 सालों बाद भी उक्त देशों से तकनीकी व हथियार खरीद कर देश के राजस्व का बड़ा भाग बर्बाद कर रहें  हैं व विदेशी निवेश से देश  को पंगु बना रहें  हैं