Thursday, 13 March 2014



केजरीवाल..., झोपड़ों में झाडू लगाने वालों के जगह , बंगलों में “वैक्यूम क्लीनर” से घर साफ़ करने वालों “ख़ास आदमी” को टिकट देकर “आम आदमी” का सफाया करने के नशे में है... 
गुरुदत्त की अंतिम क्लासिक फिल्म 'कागज के फूल' का प्रसिद्ध गीत है--बिछुड़े सभी बारी-बारी, देखी जमाने तेरी यारी! ... केजरीवाल “आम आदमी “ के नाम से ख़ास आदमी से बाग़ में “कागज के फूल” से मुंगेरीलाल वाले सपने देख रहें हैं.... 
दोस्तों "आम आदमी" के चोले में ख़ास आदमी के छोले खाने का ख्वाब है, सत्ता की बोतल में एक नई शर्बती ,शराबी है, देश की ७०% जनता जो २० रूपये भी नहीं कमाती है ..वह तो, आज भी गुठली वाला आदमी है.. भूख मारने के लिए , शराब पीता है , वह तो इनके लिए वादों का वोट बैंक का प्याला है...घुसपैठीयों के समर्थन व काश्मीरियों व अलगाववाद की बोली इनके सत्ता की “ख़ास “ हमजोली है
मोदी के पी.एम.पर सट्टा , कांग्रेस की साख पर बट्टा , केजरीवाल की कबड्डी बनी फिसड्डी ... अब हू तू तू.. बनी सू..सू..सू..., टिकट के बाग़ के माली ने पार्टी के फूलों को लूला बनाने पर बगावत