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Monday, 29 August 2016

अपने अंतिम वर्षों के दौरान , ध्यानचंद भारतीय हॉकी की स्थिति से मोहभंग हो गया था . वह कहा करते थे , " हिंदुस्तान की हॉकी खत्म हो गई है . खिलाडियों में राजनैतिक दखलंदाजी से उनकी भक्ति खोने जाने से, जीतने का जज्बा कम होते जा रहा है "


जरूर पढ़े, कैसे... वोट बैंक के जादूगरों ने (ध्यान)से  
हॉकी के जादूगर का भारत रत्नका पुरूस्कार ,(चंद ) दिनों में  देश के भ्रष्टाचारीयों ने जादू से चुराकर सचिन तेंन्दुड़कर को दे दिया...

आज संयोग से ध्यान चाँद चंद का जन्म दिन, ओलिंपिक समापन के बाद आया, हमारे १०० सालों के इतिहास की दुर्गती के मंथन का द्रुत खेल का समय आ गया ..., यह तो देश का सौभाग्य था  देश की २ महिला खिलाडियों ने MEDAL से देश के १३२ करोड़ लोगों की लाज बचा ली...

सचिन एक सेल्समैन , ध्यानचंद एक ईमानदार के साथ... ईनामदार राष्ट्रवादी खिलाड़ी. हिटलर ने भी उन्हें अपने से हिट मानकर, अपने दर्श की टीम से खेलने पर जर्मनी सेना में फील्ड मार्शल के ओहदे को ध्यानचंद ने ठुकरा दिया , आज सोने की चैन सचिन को .भष्टाचार के खाल मंत्रालय ने को भारत रत्न और ध्यानचंद की प्रतिभा को प्रतिमा बना... बनी बदरंग के साथ राष्ट्रीय खेल पर कलंक .....

क्रिकेट (भ्रष्टाचार) को राष्ट्रीय धर्म व सचिन को उसका भगवान् कहकर, देश के २५ लाख करोड़ से कही ज्यादा के काले धन को फिक्स कर , सफ़ेद धन में परिवर्तित कर , विदेशों में चला गया है... यह, खेल अब राष्ट्रवाद नहीं... भ्रष्टवाद की आड़ में खेल कर .....दर्शको के समय व पैसे की लूट का खेल खेला जा रहा ...

याद रहे आज किसी भी विज्ञापन के लिए ... जो उत्पादक कंपनिया खिलाडियों को १ करोड़ रूपये देती है तो वह जनता से १०० करोड़ रूपये लूटती है....,और विज्ञापनों से सचिन व अन्य खिलाडियों ने देश व दुनिया की जनता को भारी चुना लगाया है.... याद रहे सचिन से बड़े भारत रत्न के दावेदार”, शतरंज के महा....महारथी विश्वनाथ आनंद है, वे विज्ञापनों में लगभग नहीं के बराबर आते है...वे भारत सरकार के रवैये, से उदासीन है... और तो और मीडिया की करतूत... जो १०० नम्बर के ऊपर की रैंकिग की सानिया मिर्जा को जो तवज्जुब देती है वह विश्व के १ नम्बर के महारथी विश्वनाथ आनंद को नहीं ...याद रहे प्रथम बार वाईल्ड कार्ड के जरिये जब विम्वेल्डन के महिला सिंगल में सानिया मिर्जा को प्रवेश मिला तो... उसकी प्रतिद्वंदी सेरेना विलियम्स ने कहा , मैंने उसका आज तक नाम नहीं सुना है, और सानिया मिर्जा को पहले राउंड में बाहर/चलता कर दिया......
सचिन के ,अलविदा टेस्ट में ९०% टिकट बड़ी हस्तियों को दे दिया गया , ३ हजार रूपये के टिकट २० हजार रूपये से ज्यादा कीमतों में कालाबाजार में बिक रहे थे... सचिन के शतक पर ५ हजार करोड़ का सटटा हुआ था , शतक न जमाने पर क्रिकेट के पंडित कह रहे थी , भारत को पारी घोषित करनी चाहिए थी ताकि उन्हें दुबारा शतक बनाने का मौक़ा मिलता ...क्या यह टेस्ट मैच देश के लिए खेला जा रहा था, या सचिन को माफिया को अपने सोने की  चैन बनाने के लिए.....
आज तक किसी भी भारत रत्न से अलंकृत हस्तियों ने राष्ट्रीय संदेशोके अलावा किसी नीजी कम्पनी के विज्ञापनों से धन नहीं कमाया है ...
याद रहे... १९८३ के विश्वकप के विजेता खिलाड़ियों के ईनाम के लिए बी.सी.सी.आई. के पास पैसे नहीं थे ...तब लता मंगेशकर ने एक प्रोग्राम कर, उससे अर्जीत आय से प्रत्येक खिलाड़ी को २ लाख रूपये ईनाम के तौर पर दिये, तब तक क्रिकेट में राष्ट्रवाद की भावना थी, आज भी जनता में उस खेल की एक-एक क्षण याद है जब ....??????, खेल मंत्रालय ने तो मेजर ध्यानचंद के नाम पर मुहर लगाई थी , लेकिन ऐसी क्या ख़ास घोषणा हुई, जैसे...अजमल कसाब की फांसी की खबर प्रधानमंत्री तक को भी नहीं दी गयी थी....???, खेल मंत्रालय ने भ्रष्टाचार के खाल मंत्रालय से देश को चौका दिया....?????, जो ध्यानचंद को मिलनेवाला भारत रत्नका सम्मान मास्टर ब्लास्टर को दे दिया गया ...... सचिन को खेलते देखने राहुल गाँधी मैदान मे उपस्थित थे. मुम्बई से दिल्ली वापिस जाकर अपनी माँ , सोनिया से बात की... क्या आप जानते है कि सचिन को भारत रत्नसे नवाजे जाने की घोषणा एक दिन के भीतर आनन फानन में राहुल गांधी के पहल पर कर दी गई 

एक तो सचिन को सांसद के पिछले दरवाजे से (राज्यसभा) कांग्रेस का सांसद बनाकर , व चुनावी प्रचार में हांमी भरने से , सचिन के प्रशंसको का हालिया चुनावी वोट हथियाने का अस्त्र बनाया... यदि वे आगे के टेस्ट खेलते तो यह विवाद खडा हो उठाता था....

एक  बेबाक धावक मिल्खा सिंग को भी सचिन को भारत रत्न मिलाने पर खेल मंत्रालय व सरकार को लताडा था .

आईये जाने ध्यान चंद को.....
१९७९ में ,अपनी म्रूत्यु के दो महीने पहले ध्यानचंद ने कहा था ...मेरी मौत की खबर से , दुनिया के लोगों में रोना होगा , लेकिन भारत के लोग मेरे लिए एक आंसू भी नहीं बहायेगा..., मैं उन्हें जानता हूँ...??? .

ध्यानचंद ने अपनी करिश्माई हॉकी से जर्मन तानाशाह हिटलर ही नहीं बल्कि महान क्रिकेटर डॉन ब्रैडमैन को भी अपना क़ायल बना दिया था। ये दोनों खेल हस्तियाँ केवल एक बार एक-दूसरे से मिले थे। वह 1935 की बात है जब भारतीय टीम आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के दौरे पर गई थी। तब भारतीय टीम एक मैच के लिए एडिलेड में था और ब्रैडमैन भी वहाँ मैच खेलने के लिए आए थे। ब्रैडमैन और ध्यानचंद दोनों तब एक-दूसरे से मिले थे। ब्रैडमैन ने तब हॉकी के जादूगर का खेल देखने के बाद कहा था कि वे इस तरह से गोल करते हैं, जैसे क्रिकेट में रन बनते हैं। यही नहीं ब्रैडमैन को बाद में जब पता चला कि ध्यानचंद ने इस दौरे में 48 मैच में कुल 201 गोल दागे तो उनकी टिप्पणी थी, यह किसी हॉकी खिलाड़ी ने बनाए या बल्लेबाज ने। ध्यानचंद ने इसके एक साल बाद बर्लिन ओलिम्पिक में हिटलर को भी अपनी हॉकी का क़ायल बना दिया था। उस समय सिर्फ हिटलर ही नहीं, जर्मनी के हॉकी प्रेमियों के दिलोदिमाग पर भी एक ही नाम छाया था और वह था ध्यानचंद. 

ध्यानचंद को फुटबॉल में पेले और क्रिकेट में ब्रैडमैन के समतुल्य माना जाता है। गेंद इस कदर उनकी स्टिक से चिपकी रहती कि प्रतिद्वंद्वी खिलाड़ी को अक्सर आशंका होती कि वह जादुई स्टिक से खेल रहे हैं। यहाँ तक हॉलैंड में उनकी हॉकी स्टिक में चुंबक होने की आशंका में उनकी स्टिक तोड़ कर देखी गई. जापान में ध्यानचंद की हॉकी स्टिक से जिस तरह गेंद चिपकी रहती थी उसे देख कर उनकी हॉकी स्टिक में गोंद लगे होने की बात कही गई. ध्यानचंद की हॉकी की कलाकारी के जितने किस्से हैं उतने शायद ही दुनिया के किसी अन्य खिलाड़ी के बाबत सुने गए हों। उनकी हॉकी की कलाकारी देखकर हॉकी के मुरीद तो वाह-वाह कह ही उठते थे बल्कि प्रतिद्वंद्वी टीम के खिलाड़ी भी अपनी सुधबुध खोकर उनकी कलाकारी को देखने में मशगूल हो जाते थे. उनकी कलाकारी से मोहित होकर ही जर्मनी के रुडोल्फ हिटलर सरीखे जिद्दी सम्राट ने उन्हें जर्मनी के लिए खेलने की पेशकश कर दी थी। लेकिन ध्यानचंद ने हमेशा भारत के लिए खेलना ही सबसे बड़ा गौरव समझा। वियना में ध्यानचंद की चार हाथ में चार हॉकी स्टिक लिए एक मूर्ति लगाई और दिखाया कि ध्यानचंद कितने जबर्दस्त खिलाड़ी थे.
एक विदेशी पत्रिका ने उस समय लिखा था यह एक हॉकी का खेल है, लेकिन जादू नहीं है. ध्यानचंद वास्तव में हॉकी का जादूगर है

अपने अंतिम वर्षों के दौरान , ध्यानचंद भारतीय हॉकी की स्थिति से मोहभंग हो गया था . वह कहा करते थे , " हिंदुस्तान की हॉकी खत्म हो गई है . खिलाडियों में राजनैतिक दखलंदाजी से उनकी भक्ति खोने जाने से, जीतने का जज्बा कम होते जा रहा है "

यहां तक कि अपने अंतिम दिनों में बीमारी की वजह से , ध्यानचंद हॉकी के लिए मदद नहीं कर सके . उन्होंने अपने परिवार को याद दिलाया...मेरे पदक का ख्याल रखना और किसी को भी उसके कमरे में आने न दिया जाय. क्योकि किसी ने उनके कमरे में रखे उनके पदको पर खरोच लगा दी थी और...इसके अलावा , उनके ओलंपिक स्वर्ण पदक झांसी में एक प्रदर्शनी से एक बार चोरी हो गया था .



यह कटु सत्य है .... सचिन एक जोक की तरह अपने रिकार्ड बनाने के लिये खेल रहा था .... सचिन की तुलना ...वीरेन्द्र सहवाग से नहीं की जा सकती है , जिसने अपने दम पर १ दिन में ३०० रन बनाकर जो रिकार्ड बनाया है वह अद्भुत है, आस्ट्रेलिया में शेन वार्न, ग्लेन मैग्राफ के लिए आज भी टेस्ट के दरवाजे खुले है...लेकिन वे नई प्रतिभा को निखारने के लिए नहीं खेल रहे है, श्री लंका के मुरली धरन और ३०० विकेट ले सकते थे ... उन्हें बुलाने के बावजूद, उन्होंने नई पीढी के लिए दरवाजे खोले है ....अब तो देश में क्रिकेट को राष्टीय धर्म कह कर लूट का खेल खेला जा रहा , कृषी मंत्री भी , अपने पद को क्रिकेट मन्त्री से महान समझता था ,  यदि किसी पाठक को को  आपत्ति हो तो पूरा लेख पढ़े... फिर आलोचना करें