Tuesday, 14 April 2015

90 साल पुरानी सावरकर के जातिवाद निर्मूलन से समाज उत्थान की “कृति” कि किसी को चिंता नहीं है ..,



एक विश्व के अतुल्य क्रांतीकारी वीर सावरकर, जिनके कायल डॉ भीमराव आम्बेडकर भी थे.
दोस्तों एक साल के भीतर ही अनेकों चुनावी दौर है.., सत्ता खोरों को दलितों के घर खाना खाने की होड़ में, भगदड़ है.., हर दल, दुसरे दलों को इस वोट बैंक में डाका डालने का आरोप लगा रहा है..., 90 साल पुरानी सावरकर के जातिवाद निर्मूलन से  समाज उत्थान की “कृति” कि किसी को चिंता नहीं है .., 
याद रहें.., १९५३ में एक सांसद ने नेहरू को चुनौती दी थी कि जातिवाद निर्मूलन के नारों के बजाय, यदि प्रत्येक सांसद अपना रसोईया “दलित” रख ले तो यह देश की प्रेरणा बनकर, अपने आप ख़त्म हो जायेगी.., तब सांसदों में सन्नाटा छा गया था ..
१. एक विश्व के अतुल्य क्रांतीकारी वीर सावरकर, जिनके कायल डॉ भीमराव आम्बेडकर भी थे.
२. महात्मा गांधी की नाथूराम गोडसे द्वारा ह्त्या करने पर, कांग्रेसियों की चंडाल चौकड़ी ने जब वीर सावरकर पर “ह्त्या के लिए उकसाने” का आरोप लगाया तो नेहेरू के भारी विरोध के बावजूद डॉ भीमराव आम्बेडकर उनके बचाव में वकील बने
३. एक ब्राह्मण कुल में पैदा हुए, वीर सावरकर, आडम्बर रहित समाज कार्यों से, बिना किसी प्रसिद्धी व समाज के उत्थान के लिए कार्यरत रहे .
४. उन्होंने जितने भी कार्य किए, भारतमाता की गुलामी व जातिवाद की बेड़ियों को तोड़ने के लिए, बिना सत्ता की ललक से देश में एक महक लाने के लिए .., आज भी , देश इनका ऋण नहीं चुका सकता है.

५. पत्रकार, पतनकार से गोरी अंग्रेजों से काले अंग्रेजों के तलुवों को चाटकर.., इतिहास में वीर सावरकर के माफीनामा को कायर नामा कहकर, प्रसारित कर..., अपने को निडर बनाकर स्वंय काले अंगेजों के साथ अपने को सत्ता का भागीदार कह कर, विदेशी हाथ, विदेशी साथ, विदेशी विचार . विदेशी संस्कार से लूटने वालों के बखान से देश के खान, खदान, ईमान लूटने में भागीदार बनते गए

६. काला पानी जेल से छूटने पर रत्नागिरी जिले में निर्वासित रहने पर वीर सावरकर ने देश में, रत्नागिरी, एक मात्र जिला बना, जो जातिवाद से मुक्त था .., इसकी भूरी-भूरी प्रशंसा विश्व के अखबारों ने भी की.., आज यह हमारे इतिहास के पन्नों से गायब कर..., कि हम बुजदिल कौम थे.., यह वर्तमान इतिहास में बच्चों को पढ़ाकर युवाशक्ति का हनन किया जा रहा है.

७. निर्वासित काल में जब गांधी उनसे मिलाने रत्नागिरी गए थे.., जातिवाद प्रथा समाप्त करने की सावरकर की मुहीम का गांधी द्वारा विरोध करने पर, मतभेद होने से १० मिनट में ही गांधी नाराज हो कर उनके घर से चले गए.

८. वीर सावरकर जातिवाद निर्मूलन के “स्वर” से मृत्यु पर्यंत अडिग रहे.., भले ही उनका राणा प्रताप जैसा “घास की रोटी” खाने वाला जीवन था ..,

९. आज देश, वीर सावरकर के राष्ट्रवादी स्वरों को सार्थक कर ही उभर सकता है