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Sunday, 1 February 2015



महात्मा गाँधी का कहना था-साम्प्रयवाद के साथ शांति- शांति-शांति
जबकि वीर सावरकर का नारा था -क्रांति-क्रांती -क्रांति|

वीर सावरकर ने १९४२ में गांधी को चेतावनी देते हुए... कहा था .. यह भारत छोडो आन्दोलन नही ... भारत तोडो आन्दोलन बनेगा... उनकी हर भविष्यवाणी सार्थक हुई है..... वेबस्थल मे मैने लिखा है .. धरती का एक दूसरा चाणक्य.. अब सावरकर जैसा कोई इस धरती पर पैदा नही होगा.....???? वे प्रकांड विद्वान,कवि,लेखक,सभी धर्मों के ज्ञाता के साथ प्रख्यात इतिहासकार थे उन्हें मराठी साहित्य का कालिदास भी कहा जाता है...
एक मात्र सावरकर ही.
ज़्यादातर लोग भारत की आज़ादी को लेकर भ्रमित दिखाई देते हैं. चाटुकार संस्कृति के पोषक इतिहासकारों ने सच्चाई पर पूरी तरह से पर्दा डाल रखा है. दरअसल गाँधी और नेहरू नाम के छद्मावरण ने आज़ादी के असली हीरो को उनका वाजिब सम्मान मिलने से दूर रखा . गाँधी के वजह से भारत को 20 वर्ष पहले मिलने वाली आज़ादी 20 वर्ष बाद मिली. अगर भारत इनके आंदोलनों के वजह से आज़ाद हुआ, तो अफ्रिका और दक्षिण अमेरिका के वे छोटे-छोटे देश कैसे आज़ाद हुए, वहाँ कोई गाँधी-नेहरू नही था, जो भूख हड़ताल या आंदोलन कर रहा हो. सच्चाई यही है की दूसरे विश्वयुध के बाद इंग्लैंड की ताक़त इतनी क्षीण हो गई थी की वह अपने साम्राज्य के छोटे-छोटे देशों को भी काबू मे रख पाने में असमर्थ हो गया था, फिर भारत जैसे विशाल देश को अपने कब्ज़े मे रखना उसके वश की बात नहीं थी. अगर आज़ादी में किसी का योगदान है, तो वह उन वीरों का है, जिन्होने, भारत माता के लिए लिए अपनी जान न्योछावर करने वाले उन शहीदों का है, जिसने अपनी ज़ान दाव पर लगाके अँग्रेज़ों के दिमाग़ में ख़ौफ़ पैदा किया. उन्होंने ये सोंचने पर मज़बूर किया कि क़दम-क़दम पर उन्हें इस तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा. हर मोड़ पर उनका सामना सरदार भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, अशफ़ाक़ उल्ला ख़ान और नेताजी सुभाषचंद्र बोस जैसे क्रांतिकारीओं से होने वाला. हमें उनका एहसानमंद होना चाहिए जिन्होंने माँ-बाप, पत्नी, भाई बंधु और तमाम सुख-सुविधायों का त्याग करके हँसते-हँसते देश के लिए अपने प्राणों की बलि दे दी. लेकिन यहाँ कहानी बिल्कुल उल्टा है, हम गला फाड़-फाड़ के उनकी जयजयकार करते हैं, जिन्होंने सत्ता सुख पाने के लिए देश का बंदर-बाँट कर दिया. यह देश गाँधी-नेहरू या जिन्ना के पिता की जागीर नहीं थी... जिसको इन लोगों ने तीन टुकड़ों मे बाँट दिया.
भगतसिंह को फाँसी दी तब कहां थे.., गाँधी ,क्या फाँसी देना अहिंसा नही है? क्यों..?, आवज़ नही उठायी ? क्यों..?, भारत के सैनिक दूसरे विश्वयुद्ध मे ब्रिटन के कारण मारें हाय क्या ये हिंसा नही थी? क्यू नेताजी की आजाद हिंद फौज के सैनिको को हमारे ही सैनिको ने मार डाला ?क्या वो हिंसा नही थी ,उधम सिंह जेसे देशभक्त को जलियावाले बाग के जननरसंहार का ऑर्डर देने वाले को मार डालने की वजह से आपने गाँधी-नेहरू ने आतंकवादी बताया.. क्या ये सही है
बिल्कुल सही 1914 मे भारत स्वतंत्र हो जाता अगर लोकमान्य तिलक की बात मानकर कांग्रेस काम करती आज़ादी के बदले पहले विश्वयुद्ध मे मतदान का प्रस्ताव तिलकजी ने रखा था और वही सही था..., आप तो 20 साल की बात कर रहे है हमे 40 साल पहले आज़ादी मिल जाती.

हमने केवल कुछ पुतलों को, चौराहों पर खड़ा किया,
और कुछ लोगों को केवल, तसवीरों में जड़ा दिया।।
हमें आजादी मिलते ही सब, अपने मद में फूल गए,
शास्त्री, वीर, सुभाष, विनायक, सावरकर को भूल गए।
कयोंकि इनके नामों में कुछ, वोट नहीं मिल सकते थे,
इनको याद दिलाने से, सिंहासन हिल सकते थे।।
हमने मोल नहीं पहचाना, राजगुरू कीफाँसी का,
हमने ऋण नहीं चुकाया, अब तक रानी झाँसी का।
बिस्मिल जी की बहन मर गई, जूठे कप धोते-धोते,
और यहाँ दुर्गा भाभी ने, दिन काटे रोते-रोते।।
अब भी समय नहीं बीता है, भूलों पर पछताने का,
भारत माता के मंदिर में, अपने शीष झुकाने का।
जिस दिन बलिदानी चरणों पर, अपने ताज धरोगे तुम,
उस दिन सौ करोड़ लोगों के, दिल पर राज करोगे तुम।।
महात्मा गाँधी का कहना था-शांति- शांति-शांति
जबकि वीर सावरकर का नारा था -क्रांति-करांति-क्रांति|
लेकिन अफ़सोस आज हम उस मुकाम पर खड़े है जहाँ से इतिहास हमें चुनोती दे रहा है| आज कि पीढी वीर सावरकर के बारे मैं कुछ ज्यादा नहीं जानती है क्योंकि धर्मनिरपेक्षता का रोना रोने वालो ने देश मैं क्रांति का उदघोष करने वालो से अन्याय किया, उनका पूरा इतिहास सामने ही नहीं आने दिया| लाल रंग मैं रंगे बिके हुए इतिहासकारों ने क्रांतिकारिओं के इतिहास को विकृत किया | पाठ्य पुस्तकों से उनके जीवन सम्बन्धी लेख हटाये गए|
वीर सावरकर एक महान राष्ट्रवादी थे| भारतीय स्वंत्रता संग्राम मैं उनकी भूमिका अतुलनीय है| वीर सावरकर भारत के पहले क्रन्तिकारी थे जिन्होंने विदेशी धरती से भारत कि स्वाधीनता के लिए शंखनाद किया| वो पहले स्वाधीनता सेनानी थे जिन्होंने भारत कि पूर्ण स्वतंत्रता कि मांग की| वो पहले भारतीय थे जिनकी पुस्तके प्रकाशित होने से पहले ही जब्त कर ली गई और वो पहले छात्र थे जिनकी डिग्री ब्रिटिश सरकार ने वापिस ले ली थी| वस्तुत: वह भारतीय स्वाधीनता संग्राम के अमर सेनानी, क्रांतिकारिओं के प्रेरणास्त्रोत,
अद्वितीय लेखक, राष्ट्रवाद के प्रवर्तक थे, जिन्होंने अखंड हिंदुस्तान के निर्माण का संकल्प लिया|
उनका सारा जीवन हिंदुत्व को समर्पित था| उन्होंने अपनी पुस्तक 'हिंदुत्व' मैं हिन्दू कोण है की परिभाषा मैं यह श्लोक लिखा--
"आसिंधू सिन्धुपर्यन्तास्य भारतभूमिका |
पितृभू: पुन्याभूश्चैवा स वै हिन्दूरीति स्मृत:|| "
जिसका अर्थ है कि भारत भूमि के तीनो ओर के सिन्धुओं से लेकर हिमालय के शिखर से जहाँ से सिन्धु नदी निकलती है, वहां तक कि भूमि हिंदुस्तान है एवं जिनके पूर्वज इसी भूमि पर पैदा हुए है ओर जिनकी पुण्य भूमि यही है वोही हिन्दू है| " सावरकर का हिन्दू धर्मं से नहीं एक व्यवस्था, आस्था, निष्ठा, त्याग का परिचायक है, जो सामाजिक समरसता को बढ़ने मैं अग्रसर हो|