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Friday, 10 October 2014



याद रहे.., यदि १९४७ से आज तक के विदेशी हिन्दुस्तानीयों के धन की, पसीने से, दान स्वरुप मिली राशी का हिसाब लगाये तो यह १०० लाख करोड़ रूपये से कहीं ज्यादा है..., 
यदि विदेशीयों का यह धन, हमारे देश में नहीं आता तो आज डॉलर की कीमत १०० रूपये के पार होती.., यों कहे, विदेशी प्रवासी देश का बेड़ा पार करने के जूनून से देश में धन भेज रहें है...,वही हमारे सत्ताखोर, एक सुनियोजित योजना से.., इसे डकार कर देश डूबाने में लगें है...
खास कर खाड़ी देशों के गरीब मजदूर वर्ग , शोषित से .., उसके शोषण की आवाज भी भारतीय दूतावासों द्वारा दबा देने से.., वे आधा भोजन खा कर, धन बचाकर , हमारे देश में भेजने के बावजूद, हम आज भी कंगाल देशों की जमात में शामिल है...
यह धन आज माफियाओं ने डकार कर, देशी,विदेशी बैंकों में जकड जकड़ रखा, और कर्ज के मर्ज से देश को चलाने के लिए सत्ताखोर लूटेरा,विदेशों में भीख का कटोरा लेकर घूम रहें हैं.. भारत निर्माण से अन्य योजनाओं के नाम से देश को भरमा रहा है...

आज रूपये को सठिया कर देश में लूटेरे सेठिया बन गए , आराम हराम के नारे के जन्म से गरीबी हटाओं , मेरा भारत महान, इंडिया शाईनिंग , भारत निर्माण से नार्रों..., से बतिया कर ..., अफीमी नारों से ६७ साल से जनता को बहोशी से सुला रखा है....

इसकी आड़ में जातिवाद, भाषावाद, अलगाववाद,धर्मवाद की खाद से डॉलर का पोषण कर , जनता का शोषण किया जा रहा हैं ...
याद रहे..., १९४७ में हमारा १ रूपया = १ डॉलर था , प्रवासी भारतीय जो न के बराबर थे व डॉलर की देश में आवक शून्य थी
नेहरू के दिन का खर्चा २५ हजार रूपये व देशवासियों का २ आना से भी कम हे., इसे चुनौती देने वाले राम मनोहर लोहिया ने इस खेल को ., आराम हराम के नारों से, शांती, विदेशी संस्कृति व घोटालों से देश की नमक हलाली के खेल के खिलाफ आजीवन लड़ते रहें.., उनकी मृत्यू के बाद, उनके समाजवादी चेले ..,उनकी, औलादें भी जल्लादें बनी ...,आज भी इस खेल में बदस्तूर जारी हैं..,हर वाद का चोला ओढ़ कर..,हर पार्टी ने लूट्वाद के ढंके /छुपे चहरे से .., आज रूपये को सठिया कर देश में लूटेरे सेठिया बन गए है