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Monday, 16 June 2014



भारतीय संदर्भ में बुल्के कहते थे ‘संस्कृत महारानी, हिंदी बहूरानी और अंग्रेजी नौकरानी है.’

फादर कामिल बुल्के का जन्म एक सितम्बर, 1909 को बेल्जियम में हुआ था। प्रारम्भिक शिक्षा अपने गाँव से ही पूरी करने के बाद 1930 में उन्होंने लुवेन विश्वविद्यालय से अभियन्ता की परीक्षा उत्तीर्ण की। इस दौरान उनका सम्पर्क कैथोलिक ईसाइयों के जेसुइट पन्थ से हुआ। उन्होंने वहाँ से धार्मिक शिक्षा प्राप्त की। पादरी बनकर 1935 में वे संस्था के आदेशानुसार ईसाइयत के प्रचार-प्रसार के लिए अध्यापक बनकर भारत आ गये।
जन्म व मृत्यु : १ सितंबर १९०९, बेल्जियम के पश्चिमी फ्लैंडर्स स्टेट के रम्सकपैले गांव में. व देहान्त 17 अगस्त, 1982 को दिल्ली में हुआ।
शिक्षा: यूरोप के यूवेन विश्वविद्यालय से इंजीनियरिंग पास की. १९३० में सन्यासी बनने का निर्णय लिया.
भारत: नवंबर १९३५ में भारत, बंबई पहुंचे। वहां से रांची आ गए। गुमला जिले के इग्नासियुस स्कूल में गणित के अध्यापक बने। वहीं पर हिंदी, ब्रज व अवधी सीखी. १९३८ में, सीतागढ/हजारीबाग में पंडित बदरीदत्त शास्त्री से हिंदी और संस्कृत सीखा। १९४० में हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग से विशारद की परीक्षा पास की। १९४१ में पुरोहिताभिषेक हुआ, फादर बन गए. १९४५ कलकत्ता विश्वविद्यालय से हिंदी व संस्कृत में बीए पास किया। १९४७ में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एमए किया।[1]
रामकथा: १९४९ में डी. फिल उपाधि के लिये इलाहाबाद में ही उनके शोध रामकथा : उत्पत्ति और विकास को स्वीकृति मिली. १९५० में पुनः रांची आ गए। संत जेवियर्स महाविद्यालय में हिंदी व संस्कृत का विभागाध्यक्ष बनाया गया।
सन् 1950 ई. में ही बुल्के ने भारत की नागरिकता ग्रहण की. इसी वर्ष वे बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् की कार्यकारिणी के सदस्य नियुक्त हुये. सन् 1972 ई. से 1977 ई. तक भारत सरकार की केन्द्रीय हिन्दी समिति के सदस्य बने रहे. वर्ष 1973 ई. में उन्हें बेल्जियम की रॉयल अकादमी का सदस्य बनाया गया.
सर्वप्रथम उन्होंने दार्जिलिंग और फिर बिहार के अति पिछड़े क्षेत्र गुमला में अध्यापन किया। इस दौरान उन्हें भारतीय धर्म, संस्कृति, भाषा तथा दर्शन का अध्ययन करने का अवसर मिला। इससे उनके जीवन में भारी परिवर्तन हुआ। अंग्रेजों द्वारा भारत पर किया जा रहा शासन उनकी आँखों में चुभने लगा।

निर्धन और अशिक्षित हिन्दुओं को छल-बल और लालच से ईसाई बनाने का काम भी उन्हें निरर्थक लगा। अतः उन्होंने सदा के लिए भारत को ही अपनी कर्मभूमि बनाने का निश्चय कर लिया। उन्होंने बेल्जियम की नागरिकता छोड़ दी और पूरी तरह भारतीय बनकर स्वतन्त्रता के आन्दोलन में कूद पड़े।

यद्यपि वे फ्रेंच, अंग्रेजी, फ्लेमिश, आइरिश आदि अनेक भाषाओं के विद्वान थे; पर उन्होंने भारत से जुड़ने के लिए हिन्दी को अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया। वे राँची में विज्ञान पढ़ाते थे; पर इसके साथ उन्होंने हिन्दी का अध्ययन प्रारम्भ कर दिया। उन्होंने कोलकाता विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम.ए. की डिग्री ली। इस दौरान उनका गोस्वामी तुलसीदास के साहित्य से विस्तृत परिचय हुआ। फिर तो तुलसीदास उनके सबसे प्रिय कवि हो गये।

अब वे तुलसी साहित्य पर शोध करने लगे। 1949 में उन्हें ‘रामकथा: उद्भव और विकास’ विषय पर पी-एच.डी की उपाधि मिली। इसके बाद वे राँची के सेण्ट जेवियर कालिज में हिन्दी के विभागाध्यक्ष हो गये। तुलसी साहित्य पर गहन अध्ययन के कारण उन्हें पूरे देश से व्याख्यानों के लिए निमन्त्रण मिलने लगे। उनका नाम फादर की जगह बाबा कामिल बुल्के प्रसिद्ध हो गया।

श्री बुल्के का अनुवाद कार्य भी काफी व्यापक है। इनमें न्यू टेस्टामेण्ट,पर्वत प्रवचन, सन्त लुकस का सुसमाचार, प्रेरित चरित आदि ईसाई धर्म पुस्तकें प्रमुख हैं। अपनी पुस्तक ‘दि सेवियर’ तथा विश्वप्रसिद्ध फ्रे॰च नाटक ‘दि ब्लूबर्ड’ का नीलपक्षी के नाम से उन्होंने अनुवाद किया। हिन्दी तथा अंग्रेजी में उन्होंने 29 पुस्तक, 60 शोध निबन्ध तथा 100 से अधिक लघु निबन्ध लिखे। उनका हिन्दी-अंग्रेजी शब्दकोश आज भी एक मानक ग्रन्थ माना जाता है। 1974 में भारत सरकार ने उन्हें ‘पद्मभूषण’ से सम्मानित किया।
दरअसल एक विदेशी होने के बावजूद बुल्के ने हिन्दी की सम्मान वृद्धि,इसके विकास,प्रचार-प्रसार और शोध के लिये गहन कार्य कर हिन्दीके उत्थान का जो मार्ग प्रशस्त किया,और हिन्दी को विश्वभाषा के रूप में प्रतिष्ठादिलाने की जो कोशिशें कीं,वह हम भारतीयों के लिये प्रेरणा के साथ-साथ शर्म का विषय भी है. शर्म का विषय इसलिये क्योंकि एक विदेशी होने के बावजूद हिन्दी के लिये उन्होंने जो किया,हम एक भारतीय और एक हिन्दी भाषी होने के बावजूद उसका कुछ अंश भी नहीं कर पाये. इस शर्म को मिटाने के लिये हमारी ओर से और अधिक दृढ-प्रतिज्ञ और एकनिष्ठ होकर हिन्दी हित में कार्य किये जाने की जरूरत थी जो कि वर्तमान माहौल में फिलहाल संभव नहीं हो पा रहा है. हिन्दी जगत के लिये यह एक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है. इससे उबरकर हिन्दी के उत्थान के लिये हमें फादर बुल्के के पद-चिन्हों पर चलने की जरूरत होगी.